India's Most Vibrant Literature Festival • 14th, 15th, 16th November 2025

प्रणव माय फ़ादर –


प्रणव माय फ़ादर

इंदौर लिटरेचर फ़ेस्ट का एक महत्त्वपूर्ण सत्र था "प्रणव माय फ़ादर", जिसकी खास अतिथि थीं शर्मिष्ठा मुखर्जी। शर्मिष्ठा मुखर्जी भारतीय राजनेता, शास्त्रीय नृत्यांगना और लेखिका हैं। वे भारत के 13वें राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी की पुत्री हैं। जनसेवा की विरासत पाकर, शर्मिष्ठा ने कला और सार्वजनिक जीवन दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। प्रशिक्षित कथक नृत्यांगना के रूप में उन्होंने अपनी गरिमा और प्रतिभा से विश्व मंच पर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को उजागर किया। इसके बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ीं।

आज वह इस मंच पर एक लेखिका और एक बेटी की भूमिका निभा रही थीं, जिन्होंने अपने पिता के जीवन पर पुस्तक लिखी है। इंदौर के बारे में बात करते हुए शर्मिष्ठा ने कहा कि यह देश का सबसे स्वच्छ शहर है और यही बात उन्हें सबसे अच्छी लगती है। यहां आने पर खुला नीला आसमान देखना एक ऐसा दृश्य है, जो दिल्ली में दुर्लभ है।

शर्मिष्ठा बताती हैं कि उनकी पुस्तक उनके पिता के जीवन को दर्शाती है, उनके राजनीतिक करियर और व्यक्तिगत पहलुओं को उजागर करती है। यहकिताब लिखने का विचार मूल रूप से उनका नहीं था, लेकिन बेटी होने के नाते यह जिम्मेदारी उन्हें उनके पिता द्वारा दी गई थी। उनके पिता रोज अपनी बातें डायरी में लिखते थे और सभी उत्सुक रहते थे यह जानने के लिए कि वे रोज क्या लिखते हैं। यह उत्सुकता इसलिए भी थी क्योंकि यह उनकी यात्रा का आइना थी और उनके जीवन में एक अंदरूनी दृष्टि लोगों को दे सकती थी।

उनके पिता ने यह तय किया था कि जब तक वे जीवित हैं, उनकी डायरी किसी को नहीं पढ़ने दी जाएगी। उनका यह आग्रह और जिद थी कि डायरी उनकी मृत्यु के बाद ही पढ़ी जाए और पुस्तक के रूप में लोगों तक पहुँचाई जाए। शर्मिष्ठा बताती हैं कि जब उन्होंने डायरी पढ़ी, तो उन्हें अपने पिता का वह रूप भी पता चला जिससे वो पहले अज्ञात थी। वो बताती है कि उनके परिवार में हमेशा से ही जानवरों के प्रति प्रेम रहा है, इसलिए घर में बचपन से ही कुत्ते रहते थे। उनके पिता एकऐसीपीढ़ी से आते है जो भावुकता दिखानेपर विश्वास नहीं रखती और फिर वो एक राजनेता भी थे, लेकिन डायरी में एक घटना पढ़कर शर्मिष्ठा को पता चला कि उनके पिता रोभी सकते थे। उन्होंने लिखा था कि घर एक कुत्ते ‘जिम्बो’ के मरने पर दिनभर उनके मन में भारीपन रहा और दिन के अंत में उन्होंने बाथरूम में चुपचाप खूब रोया। यहशर्मिष्ठाके लिए कल्पना से परे था, लेकिन इस किस्सेने उन्हें यह सिखाया कि हर मनुष्य का एक ऐसा पक्ष होता है जो दूसरों को पता नहीं होता और इससे उन्हें गहरा दृष्टिकोण मिला।

शर्मिष्ठा बताती हैं कि यह पुस्तक लिखना एक जिम्मेदारी का कार्य था। यह तय करना कि डायरी की कौन-सी बातें लिखी जाएं और कौन-सी नहीं, बहुत कठिन था। हालांकि उनके पिता ने हमेशा स्पष्ट रखा कि यदि कोई सरकार से जुडी कोई संवेदनशील जानकारी हो तो उसे पुस्तक में शामिल न किया जाए। कुछ घटनाएँ थीं जो उनके पिता के राजनीतिक जीवन से जुड़ी थीं। प्रणब मुखर्जी और उनके पूर्वज कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे। उन्होंने हमेशाइंदिरा गांधी और पार्टी का सम्मान किया, लेकिन अंतिम दिनों में वे कांग्रेस के भविष्य की चिंता करने लगे थे। उन्हें लगता था कि बी.जेपी. जैसी पार्टियाँ किसी से भी गठबंधन कर पार्टी को कमजोर कर देती हैं, जबकि कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों से संघर्ष करना पड़ रहा था। वे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर भी चिंतित थे। इन विषयों पर लिखना शर्मिष्ठा के लिए मानसिक चुनौती थी, लेकिन शायद यही कारण था कि उनके पिता ने यह जिम्मेदारी उन्हें दी, क्योकि वो जानते थे कि उनकी बेटी बेबाक स्वाभाव की हैंऔर अपने मन कि हर बात सरलता से कह देनेकी हिम्मत रखती हैं।

शर्मिष्ठा ने बताया कि उनके पिता राष्ट्रपति बनने के बाद भी कार्यक्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय रहे। शपथ ग्रहण के दिन की डायरी एंट्री में उन्होंने लिखा कि आज परिवार के साथ एक स्वतंत्र शाम बिताई। अगले दिन उन्हें खाली समय में ऊब महसूस हुई। और उसके अगले दिन तो वो भडक उठे क्योकि वे हमेशा समस्या समाधान और कार्य के केंद्र में रहते थे। हाई-एक्शन कार्य से अचानक कम व्यस्त जीवन में परिवर्तन उनके लिए चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने नवाचार और युवाओं की भागीदारी पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में नवाचार मेला शुरू किया, ताकि देश के युवाओं को यह सिखाया जा सके कि केवल धन पर ध्यान न दें, देश के प्रति जिम्मेदारियाँ भी निभाएँ।

शर्मिष्ठा बताती हैं कि उनके पिता बहुत अनुशासित थे। उनके जीवन के तीन आधार थे—सैर, पूजा और डायरी। यदि किसी दिन कोई कार्य छूट जाता, तो उन्हें बहुत बेचैनी होती। इसकेविपरीतउनकी माता गायिका और चित्रकार थीं, इसलिए उनमें कठोर अनुशासन नहीं था, और शर्मिष्ठा कहती हैं कि उन्हें अपनी माता की यह विरासत मिली।

एक मज़ेदार किस्सा बताते हुए शर्मिष्ठा कहती है कि वो हमेशा से ही अर्थशास्त्र में कमज़ोर रही,राजनीति में प्रवेश के बाद, पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद जब इस विषयमें कठिनाइयाँ महसूस कीं तो इस विषय को सीखने वो अपने पिता के पास जा पहुंची,थोड़ेप्रयास के बाद उनके पिता ने उन्हें पहले प्राथमिक स्तर की पाठ्यपुस्तकें पढ़ने की सलाह दे दी। शर्मिष्ठा यह भी बताती हैं कि मोदी सरकार का डिजिटल बैंकिंग का दृष्टिकोण उन्हें सफल और सराहनीय लगता, इसे देख उनके पिता काफी खुश होते।

अंत में शर्मिष्ठा कहती हैं कि वे अपने पिता के हर निर्णय तुरंत नहीं समझ पाती थीं। कई बार उनसे असहमत भी हो जाती थीं। लेकिन समय और अनुभव के साथ, और उनके पिता की डायरी पढ़ने के बाद, उन्हें उनके विचार और निर्णय बेहतर समझ में आने लगे। अब वे यह जानती हैं कि प्रणब मुखर्जी हमेशा अपनी इच्छा और समझ के अनुसार कार्य करते थे। वो कहती है कि उनके पिता कि डायरीयां अब संग्रह का हिस्सा बनेगी और लोग उनके दृष्टिकोण और जीवन यात्रा के बारे में जान पाएंगे।