लय बदलती कविता के सत्र में इंदौर लिटरेचर फ़ेस्ट ने अपने मंच पर कवि रामायण धर द्विवेदी का हार्दिक स्वागत किया। रामायण ने अपने कार्यक्षेत्र की शुरुआत एक अभियंता के रूप में की थी और सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा भी किया, परन्तु साहित्य के प्रति उनका प्रेम उन्हें वहीं ले आया जहाँ उनकी आत्मा का निवास था। आज वे एक प्रतिष्ठित हिंदी कवि, गीतकार और प्रेरक वक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी कविताओं में भावनात्मक और सांस्कृतिक संवेदना सहजता से प्रवाहित होती है। उनकी भाषा में न आधुनिकता कि चमक है और न पुरातनता की जटिलता—वे आम जनमानस की आवाज़ हैं, सरल, सीधी और हृदय को छू लेने वाली। देश के प्रमुख मंचों से लेकर राज्यसभा तक, उनकी वाणी में हिंदी की आत्मा गूंजती है। डॉ. कुमार विश्वास द्वारा प्रदान किया गया युवा गीतकार सम्मान तथा अनेक पुरस्कार उनकी साहित्यिक यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं।
वर्डस्वर्थसे प्रेरितरामायण धर द्विवेदी कहते हैं कि उन्हें अपने अंदर का मनुष्य जीवित रखना है, इसलिए वे साहित्य के पास जाते हैं। वह खुद को कवी नहीं कहते, बल्कि जीवन की यात्रा में एक यात्री मानते हैं। उनके शब्द उनके होने का प्रमाण हैं और उनके अनुभवों से जन्मी कविताएँ आम लोगों तक उनके जीवन के अनुभव और दृष्टिकोण को पहुँचाती हैं। बचपन से पिता के माध्यम से उन्हें हिंदी और संस्कारों के संस्कार मिले और उन्होंने देखा-सीखा और अपने अनुभवों को शब्दों में पिरोकर समाज के सामने रखा।
रामायण धर द्विवेदी बताते हैं कि साहित्य से उनका प्रथम परिचय उनके पिता के माध्यम से हुआ। उनके पिता ने ही बचपन से उन्हें यह सीख दी थी कि जहाँ भी जाओ, वहाँ के अनुभव घर लौटकर दोनों भाषाओं में लिखो। इसी अभ्यास ने उनमें लेखन की आदत डाली, भाषाओं पर पकड़ मज़बूत की और साहित्य के प्रति स्वाभाविक रुचि विकसित की। आगे चलकर ईश्वर की कृपा और लगातार श्रम-साधना के साथ उन्होंने लिखना आरम्भ किया, परन्तु इस सम्पूर्ण यात्रा का श्रेय वे निसंकोच अपने पिता को देते हैं।
उनका मानना है कि कविता परीक्षा चाहती है, परिश्रम चाहती है। यदि कवि यह सोचकर लिखे कि कितने लोगों ने पढ़ा या कितना यश मिलेगा, तो वह सफल नहीं हो सकता। कविता में साहित्यकार की भावना होनी चाहिए—कविता लोगों को प्रसन्नता दे, उजाला दे, मनुष्य को भीतर से उठाए और भ्रम दूर करे। वे कहते हैं कि एक सार्थक शब्द युगों तक प्रेरणा दे सकता है, इसलिए आवश्यक है कि रचनाकार अपने शब्दों में प्रभाव और सकारात्मकता लाए। जब कवि स्वयं से ऊपर उठकर रचना करता है, तभी उसकी कविता सच्चे अर्थों में सार्थक बनती है।
रामायण बताते हैं कि उनके प्रारम्भिक दिनों की कविताओं में से “मैं दीप बनूँ, मैं गीत बनूँ” आज भी उनकी प्रिय रचना है। यह कविता उनकी उस आरंभिक संवेदनशीलता और सरल भावभूमि का प्रमाण है, जो आज उनके समस्त लेखन की पहचान बन चुकी है।
इस सत्र का समापन कवि रामायण ने शिव पर आधारित अपनी लोकप्रिय कविता के पाठ से किया। उनकी वाणी में भरी आत्मीयता और श्रद्धा ने पूरे सभागार को अद्भुत शांति और भावपूर्ण ऊर्जा से भर दिया। उनके शब्दों ने यह फिर सिद्ध किया कि जब भाव ईमानदारी से बोले जाएँ, तो वे केवल सुने नहीं जाते—मन में बस जाते हैं।