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राहगीर – मेरी राह के काँटे और फूल, आँसू और मुस्कान


राहगीर-

मेरी राह के काँटे और फूल, आँसू और मुस्कान
इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल के सत्र “मेरी राह के काँटे और फूल, आँसू और मुस्कान” में RJ ताथागत ने कहा कि इतने प्रतिष्ठित आयोजन का हिस्सा होना हमेशा गर्व की बात है, और राहगीर जैसे कलाकार से संवाद करना एक अलग ही खुशी देता है। राहगीर ने मुस्कुराते हुए बताया कि यह उनका इंदौर का दसवाँ दौरा है। वे जबभीइंदौरआतेहैं हर बार उतरतेहीविकास टी-स्टॉल परइंदौरका पोहा खाकर ही आगे काम शुरू करते हैं।उन्होंनेइसेएकनियमजैसाबनालियाहैऔरइसरूटीनकोकाफीपसंदकरतेहै।

अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए राहगीर ने बताया कि शुरुआत के कुछ साल घूमते-घूमते, बसकिंग करते बीते। जहाँ भी गिटार निकालते, लोग जमा हो जाते।इससफरमेंकुछगलतलोगभीमिले, मुम्बई के कार्टर रोड पर हुए एक ऐसे ही जैमिंग सेशन में कोई उनके पास आया और कहा कि आपके गाने अच्छे हैं, इन्हें एनजीओ के लिए दे दीजिए। उसने खुद को प्रोडक्शन हाउस वाला बताया और मुम्बई ऑफिस बुलाया। लेकिन जब वे वहाँ पहुँचे तो माहौल बिल्कुल अलग था—टीम किसी और ही फील्ड की थी। राहगीर ने दो घंटे तक परफॉर्म किया और फिर लौट आए। उन्हें साफ समझ आ गया कि वह जगह हीगलत थी।

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर इस लाइन में आने के फैसले पर बात करते हुए राहगीर ने बताया कि वे हमेशा से कविताएँ लिखते थे। कॉलेज पूरा हुआ, नौकरी मिली, और नौकरी भी अच्छी थी। वे गाँव के पहले ग्रेजुएट थे, एक महंगी यूनिवर्सिटी में पढ़े थे, इसलिए परिवार के लिए पढ़ाई और नौकरी दोनों का बहुत महत्व था। शुरुआत की 30–50 हज़ार की सैलरी से घर में सब खुश थे, ऐसे में सब छोड़ने का फ़ैसला आसान नहीं था। घरवाले समझ नहीं पाते थे क्योंकि उन्होंने कभी ऐसे कलाकारों की ज़िंदगी नहीं देखी थी, वोगायककेनामपरउनलोगोंकोहीजानतेथे जो शादी-जगरों में गाकर गुज़ारा करते हैं। परिवार का डर बस इतना था कि बेटाभटकता नरह जाए। शुरुआत में सुनना भी बहुत पड़ा, लेकिन मन में एक ज़िद थी—कुछ अलग करने की, वही उन्हें इस रास्ते पर ले आई।

सबसे कठिन अनुभव बताते हुए उन्होंने साझा किया कि एक बार वे एनजीओ के शो के लिए एक रिसॉर्ट पहुँचे थे। वो कहानी कहने की शैली में गीत सुनाते है, पर बार खुलते ही महफ़िल दूसरी दिशा में बह गई। लोग अपनी मस्ती में खो गए और राहगीर चुपचाप खड़े रहे। उन्होंने विनती की कि अगर कोई सच में सुनेगा तभी गाएँगे—क्योंकि उनके गीत सुनने से ही अपनी पहचान पाते हैं, सिर्फ शोर में डूब जाने से नहीं।

अपने नाम “राहगीर” के पीछे की कहानी बताते हुए वे कहते हैं कि उन्हें यात्रा का शौक था और अपने गीतों में वे अपना विश्वास, अपना जीवन-दर्शन व्यक्त करते हैं। इसलिए उन्हें ऐसा नाम चाहिए था जो जीवन, सफर और उनकी थीम—तीनों के साथ सहजता से जुड़ सके। वे ऐसा नाम चाहते थे जो किसी धर्म, किसी जाति, किसी पहचान में बंधा न हो—एकदम तटस्थ, खुला और सबका। इसी सोच से उन्होंने “राहगीर” नाम चुना—एक ऐसा नाम जो उनके काम, उनकी यात्राओं, और उनके भीतर के खोजी मन का सच्चा प्रतिबिंब है।

राहगीर कहते हैं कि कविता सब लिखते हैं, हर किसी के पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है, पर उन्हें कंट्री म्यूज़िक सुनने, आत्मकथाएँ पढ़ने और दुनिया को वैसा देखने का अलग अंदाज़ मिला। वे बताते हैं कि वे किसी भी चीज़ के पीछे अंधाधुंध नहीं भागते—ना यह सोचते हैं कि किसी एक चीज़ के बिना जीवन अधूरा है। बस एक भरोसा रखते हैं कि “कर के देख लो, खुद पर कुछ थोपो मत, जीवन बड़ा है—कुछ न कुछ हो ही जाएगा।” और जब इंसान ईमानदारी से आगे बढ़ता है, तो दुनिया भी रास्ते खोल देती है।

उन्होंने बताया कि उनकेलिएसबसे बड़ा मोटिवेशन बस यही था कि गानेऔरगानेलिखनेका, इस राह पर चलने कामन बहुत करता था । बॉब डिलन की संगीत-यात्रा और कंट्री साइड जीवनशैली से वे गहराई से प्रभावित थे। उन्हीं को सुनते-सुनते उन्होंने अपने गीतों और लेखन में वह सादगी, वह सच्चा दिल और वह जीवन-दर्शन उतारना शुरू किया। देश के कई राज्यों में घूमे, ऐसे इलाकों में भी जहाँ पहले कभी नहीं गए थे। 45 दिन का टेंट वाला सफर किया, पर कभी टेंट लगाने की नौबत नहीं आई, क्योंकि हर जगह अच्छे लोग मिले। स्कूलों और कॉलेजों में गाने गाए और वहीं समझ आया—अगर किसी का शोषण नहीं करना, कुछ गलत नहीं करना तो दुनिया भी आपको लौटाती है। आप संतुलन बनाए रखेंगे तो जीवन अपने रास्ते खोल देगा।

जमाने के साथ चलना, लोगों से हाथ जोड़कर मिलना—ये सब वे सहजता से स्वीकारते हैं। उनका मानना है कि कोई बिल्कुल सही या बिल्कुल गलत नहीं होता; बस इरादा साफ़ होना चाहिए। वे अपने गीतों में लोगों से जुड़ी कहानियाँ, भावनाएँ और रिश्ते लिखते हैं—इसलिए लोग उनसे जुड़ते हैं। वे कहते हैं, “जब तक मन इस सफ़र का आनंद ले रहा है, सब ठीक है। ज़बरदस्ती नहीं, बोझ बन जाए तो संगीत ख़त्म हो जाता है। अपनाकामदिल से करो।”