साहित्य समाज का एक अहम हिस्सा है, जो हमारी संस्कृति को सहेजता है, उसे सहजता से नए समय और नई पीढ़ी तक पहुँचाता है। इसलिए साहित्य को जीवित रखना केवल हमारा कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी आवश्यकता भी है। इसी आवश्यकता और कर्तव्य का निर्वाह करते हुए इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल पिछले दस वर्षों से साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों को एक ही मंच पर जोड़ने का काम कर रहा है। यह कविता, कहानी, संस्कृति और सिनेमा के रंगों को लोगों तक सरल, सुगम और निजी रूप में पहुँचाने का सशक्त माध्यम बना है।
इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2025 के 11वें सीज़न के पहले दिन डेली कॉलेज परिसर साहित्य, कला और संस्कृति के रंगों से सराबोर दिखाई दिया। कार्यक्रम की शुरुआत माजिद खान और उनकी टीम द्वारा प्रस्तुत राजस्थानी लोकगीतों से हुई, जहाँ “पधारो म्हारे देश” ने मेहमानों का गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके तुरंत बाद डेली कॉलेज के विद्यार्थियों ने मनमोहक शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति दी, जिसने उद्घाटन समारोह के माहौल को और अधिक सांस्कृतिक और भव्य बना दिया। समारोह में मुख्य अतिथि विवेक रंजन, विनय सहस्त्रबुद्धे, के साथ शहर के कई गणमान्य अतिथि और बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
अपने स्वागत भाषण में श्री प्रवीण शर्मा ने इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल के 11वें सीज़न में सभी का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि एक दशक से लगातार इस आयोजन को सफलतापूर्वक किया जा रहा है और इसका उद्देश्य साहित्य, कला तथा संगीत को समाज के उन तबकों तक पहुँचाना है जहाँ इसकी सबसे अधिक जरूरत है। उनका यह संदेश पूरे माहौल में आत्मीयता और उद्देश्यपूर्ण ऊर्जा भर गया।
कार्यक्रम में लेखक, विचारक और प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ विनय सहस्त्रबुद्धे ने साहित्य, भारतीय लोकचेतना और समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने सौम्य संपदा यानी सॉफ्ट पावर पर बात करते हुए कहा कि भारत का इतिहास हमेशा से विभिन्न राष्ट्रों से संबंधों से भरा रहा है और यही कारण है कि आज भी दुनिया के 150 से अधिक देशों में हिंदी बोली जाती है। उन्होंने देश को अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को दुनिया के सामने अपनाने की जरूरत पर ज़ोर दिया, ताकि योग, कथक और अन्य समृद्ध कलाएँ अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए वैश्विक विरासत के रूप में भी स्थापित हों। उन्होंने इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताते हुए शुभकामनाएँ दीं।
द कश्मीर फ़ाइल्स जैसी चर्चित फिल्मों के लिए प्रसिद्ध डॉ. विवेक रंजन अग्निहोत्री ने “सिनेमा और इतिहास” पर गहन और प्रेरक चर्चा की। उन्होंने कहा कि सिनेमा समाज का आईना कहा जाता है, पर यह उसकी जिम्मेदारी भी है कि वह सच को ईमानदारी से प्रस्तुत करे। मनोरंजन गलत नहीं, पर अधूरा है—यह बात उन्होंने स्पष्टता से रखी। उनके अनुसार देश को आगे बढ़ाने के दो रास्ते हैं: पहला, प्रेरणादायक नायक; और दूसरा, समाज और देश की कहानियों का सही चित्रण। उन्होंने कहा कि आज के नायक समाज की वास्तविकताओं से दूर होते जा रहे हैं और इसे बदलने के लिए साहित्य, कला और संस्कृति के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाना आवश्यक है। विवेक ने कहा कि साहित्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, और ऐसे महत्त्वपूर्ण आयोजन यह भरोसा दिलाते हैं कि समाज सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, क्योंकि कला, साहित्य और संगीत की समझ ही मनुष्य को बाकी जीवों से अलग करती है।
दिनभर चले अन्य सत्रों में विकसित भारत पर संवाद, समकालीन लेखन और बदलती कला-दिशाओं पर सार्थक चर्चा हुई। दिन का समापन एक शानदार कवि सम्मेलन से हुआ, जिसमें सोनरूपा विशाल, रामायणधर चतुर्वेदी, विवेक चतुर्वेदी और अमन अक्षर ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार और राष्ट्रभाव से भरी कविताओं ने पहले दिन को यादगार और ऊर्जावान बना दिया।
पहला दिन बड़ी संख्या में आए छात्रों, साहित्यप्रेमियों और कला-रसिकों की उपस्थिति के साथ अत्यंत सफल और जीवंत रहा। आयोजन समिति ने बताया कि इस शानदार शुरुआत ने आगामी दो दिनों के उत्साह को और बढ़ा दिया है, और इंदौर लिटरेचर फ़ेस्टिवल अपनी परंपरा के अनुरूप साहित्य का यह पर्व पूरे वैभव के साथ आगे बढ़ाएगा।