India's Most Vibrant Literature Festival • 14th, 15th, 16th November 2025

बडिंग ऑथर्स


बडिंग ऑथर्स

‘बडिंगऑथर्स’ के सत्र में अदिति श्रीवास्तव और नविशा गुप्ता ने साहित्य का एक नया पहलू लोगों के सामने रखा—यह बताते हुए कि साहित्य न उम्र का मोहताज है और न ही किसी बंधन का। एक तरफ नविशा, जो अभी स्कूल में हैं, अपने लिखने के शौक को बचपन में ही एक पेशेवर रूप दे रही हैं, वहीं अदिति अपनी ऑफिसकीज़िंदगी से कुछ पल चुराकर शब्दों को मायने देने में अपना समय बिताती हैं।

कामकाजी जीवन और रचनात्मकता को संतुलित करने की बात पर अदिति ने कहा कि वे तर्क और कला—दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहती हैं। दिन में 9 से 6 तक तर्क का इस्तेमाल करती हैं और शाम 6 से 9 तक भावनाओं का। उनके अनुसार इसे संभालने की जरूरत ही नहींक्योंकि पेशा दिमाग की बात है और कविता दिल की, और दोनों बिल्कुल अलग दुनिया हैं।

अपनी किताब ‘सांझ’ के बारे में बात करते हुए अदिति ने बताया कि प्रेम और जुदाई एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। एक उम्र में हर किसी को लगता है कि प्यार हुआ है और दर्द मिला है, लेकिन सच यह है कि हम सब प्रेम से कहीं न कहींअनछुएही रह जाते हैं और अक्सर उलझन में रहते हैं। यही सवाल उनकी किताब की नींव हैंकि शब्दों में प्रेम कैसा दिखता है, दर्द कैसा दिखता हैताकि लोग जुड़ सकें और महसूस कर सकें कि वे इन भावनाओं को अकेले नहीं झेल रहे। उन्होंने बताया कि इस किताब को लिखना उन्होंने एक शाम से शुरू किया थाऔर इसी एहसास पर इसका शीर्षक टिका है।

नविशा, जो नौवीं कक्षा में हैं और तीन किताबें लिख चुकी हैंबतातीहैंकि उन्होंने छोटी-छोटी कहानियाँ तीसरी कक्षा से ही लिखना शुरू कर दी थीं। उनकी मौसी, जो अंग्रेज़ी की शिक्षिका हैं, उन्होंने सुझाव दिया कि सारी कहानियाँ इकट्ठा करके एक किताब बनाई जाए। कोविडकेदौरानलॉकडाउन का समय उनके लिए एक अवसर बन गया जिसने उन्हें लिखने और पुस्तक को प्रकाशित करने का समय दिया। तब से वे हर साल एक किताब प्रकाशित कर रही हैं।

नविशा रोज़मर्रा की उन बातों पर कहानियाँ लिखती हैं जिन्हें सब देखते हैं, पर कोई उनके पीछे की कहानी नहीं सोचता। एक बार उन्हें 500 का नोट मिला, उन्होंने सोचा कि उनकेपासआनेसेपहलेयह नोट कितने हाथों में गया होगा, कितनी यात्राएँ की होंगी। उसी दृष्टिकोण से उन्होंने एक कहानी लिखी।

नकारात्मक प्रतिक्रिया से कैसे निपटती हैं, इस पर नविशा ने बताया कि उनकी पहली किताब को खूब प्रशंसा भी मिली और आलोचना भी। उन्होंने दोनों को सुनाहर राय को समझा, देखा कि क्या अपनाना है और फिर अपने हिसाब से सुधार किए।

अदिति ने कहा कि अभीउनकी पहली पुस्तकपब्लिशहुईहै और अब उन्हें प्रशंसा और आलोचना दोनों मिलनेकीशुरुआत होगी। उनका कहना है कि अगर लोग जुड़ नहीं पाएँगे, तो वे आलोचना करेंगेक्योंकि बात सिर्फ इतनी है कि आपके शब्द किसी के दिल को छू पाते हैं या नहीं।

लेखन में रुकावट आने यानिराइटर्सब्लॉकपर नविशा ने बताया कि कई बार ऐसाहोता है जबउन्हें समझ नहीं आता कि क्या लिखें, तो वे खुद पर दबाव नहीं डालतींबस घूमने निकल जाती हैं और विचारोंकेपीछेभागनेकीजगहनएविचार को आने का समय देती हैं। अदिति इसके उलट खुद को फिर से सँवारने, उम्मीद वापस लाने और अँधेरे से बाहर निकलने की प्रक्रिया पर ध्यान देती हैं।

नएलेखकोंकेलिएपुस्तक प्रकाशित करने पर सलाह देते हुए अदिति कहती हैं कि अगर हिस्सों में लिख रहे हो तो दिल से लिखो, बिना किसी बदलाव केक्योंकि सच्ची भावनाएँ सीधे दिल तक पहुँचती हैं। अपनी किताब के पीछे का श्रेय वे सागर को देती हैं, जिन्होंने दो साल पहले उनकी कविताएँ पढ़कर कहा था कि इन्हें एक पुस्तक में संजोना चाहिए।नविशा अपनी पुस्तकों का श्रेय अपनी मौसी को देती हैं, जो आज भी उनकी किताबें पढ़ती हैं, गलतियाँ बताती हैं और प्रकाशन में पूरी मदद करती हैं।

अंत में जब पूछा गया कि अगर वे अपने अतीत में जाकर खुद से मिलें तो क्या कहेंगी, नविशा ने कहा कि वे खुद से कहेंगी, “मुझे तुम पर गर्व है, लोगों के कहने की चिंता मत करो, लिखती रहो।”अदिति ने बताया कि आठवीं कक्षा में जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, वे खुद को बहुत साधारण समझती थीं, लेकिन उनके माता-पिता एक-एक पंक्ति पढ़कर उनकाउत्साहबढ़ातेथे, कहते थे कि बहुत अच्छा लिखा है। आज वे अपने लेखन के पीछे अपने माता-पिता, भाई-बहन और उन सभी लोगों को धन्यवाद देती हैं जिन्होंने उन्हें प्रेरित किया और यह महसूस कराया कि “तुम लिख सकती हो।”

यह सत्र सिर्फ बातचीत नहीं था, बल्कि यह एहसास दिलाने वाला पल था कि लेखन उम्र का इंतज़ार नहीं करता, यह बस एक संवेदनशील दिल, खुले मन और देखने-समझने की क्षमता से शुरू हो जाता है।औरअगरलिखनेकीचाहहोतोकोईबंधनआपकोरोकनहींसकता।